छत्तीसगढ़

31 साल पुराने अंधविश्वास हत्या मामले में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा

Shantanu Roy
8 Nov 2025 11:49 PM IST
31 साल पुराने अंधविश्वास हत्या मामले में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा
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Bilaspur. बिलासपुर। 31 साल पुराने अंधविश्वास से जुड़े हत्या मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को पलट दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए आरोपी बरी नहीं किए जा सकते कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की गवाही कोर्ट में पेश नहीं हुई। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(2) के तहत पोस्टमार्टम रिपोर्ट बिना डॉक्टर की गवाही के भी स्वीकार्य होती है यदि अन्य सबूत मजबूत हों।
मामला और पृष्ठभूमि
यह मामला 5 फरवरी 1994 का है, जब महासमुंद जिले के बनियाटोरा गांव में एक ग्रामीण युवक रतन को भूत-प्रेत का शिकार बताया गया। ग्रामीणों ने झाड़-फूंक कर रतन और उसकी बहू को डायन होने का आरोप लगाया। अगले ही दिन हथियारबंद भीड़ मृतक के घर पहुंची और उसकी पत्नी, बेटे और बहू की पिटाई के बाद रतन को बेरहमी से बाड़ी में घसीटकर मार डाला। घटना में घायल हुए मृतक के बेटे, पत्नी और पिता ने कोर्ट में बयान दिया कि आरोपी 10 से अधिक थे और जान से मारने की नियत से आए थे। जांच में बरामद हथियारों पर खून के निशान भी मिले थे।
ट्रायल कोर्ट की गलती
हालांकि ट्रायल कोर्ट ने केवल इस आधार पर आरोपियों को हत्या से बरी कर दिया कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की गवाही प्रस्तुत नहीं हुई। इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हुई, क्योंकि अन्य गवाहों की गवाही और सबूत पर्याप्त थे।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दलील को मनमाना और कानून के विरोधाभासी बताया। अदालत ने कहा कि घायल गवाहों के बयान, बरामद हथियार और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से घटना सिद्ध होती है। डॉक्टर की गवाही न होना हत्या को नकारने का आधार नहीं बन सकता। इसलिए हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को धारा 302/149 के तहत दोषी करार दिया और उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने सभी दोषियों को आदेश दिया कि वे एक महीने के भीतर अदालत में सरेंडर करें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो पुलिस को उनकी गिरफ्तारी करने का निर्देश दिया गया है।
न्यायिक दृष्टिकोण
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि साक्ष्यों का संतुलित मूल्यांकन करना आवश्यक है और केवल तकनीकी कारणों से दोषियों को बरी करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि इस मामले में गवाहों की साक्ष्य और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर्याप्त थे, जिससे हत्या की पुष्टि होती है। यह फैसला पुराने अंधविश्वास आधारित अपराधों में न्याय के लिए मिसाल साबित होगा। अदालत ने यह संदेश भी दिया कि अब किसी भी तकनीकी वजह से दोषियों को छूट नहीं दी जाएगी और सबूतों का समग्र मूल्यांकन ही निर्णय का आधार होगा।
स्थानीय प्रतिक्रिया और आगे की कार्रवाई
स्थानीय प्रशासन ने हाईकोर्ट के आदेश का स्वागत किया। पुलिस ने कहा कि दोषियों की गिरफ्तारी के लिए विशेष टीम गठित की जाएगी। न्यायालय द्वारा तय समय सीमा में न सरेंडर करने पर पुलिस कार्रवाई तत्काल सुनिश्चित करेगी। यह मामला छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास और सामूहिक हिंसा के खिलाफ न्याय प्रणाली की सक्रिय भूमिका को भी दर्शाता है। हाईकोर्ट का यह फैसला 31 साल पुराने मामले में न्याय की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है और यह भविष्य में ऐसे मामलों में उदाहरण बनेगा।
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